dard bhari shayari
सियासत सियासत करती है शहीदों के नाम पर
कभी रोती हुवी बेटी के इसने आँसूं नहीं पौंछे
जिन घावों पे तुमको मरहम लगाना था
चुन चुन कर शब्दों से खंजर ही खंजर घोंपे।
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यहाँ से वहाँ हम इतने घर बदलते हैं
बचपन वाले यारों से मिलने को तरसते हैं।
बगीचे से चुराकर जो आम खा लिया करते थे
काका की डाँट सुनकर हम अब भी कान पकड़ते हैं।
उस शहर में रात बहुत ठंडी रहती थी
आज भी हम नींद में चादर से मुँह ढका करते हैं।
खुशनसीब तो होते ही होंगे वो लोग जो अपने गाँव में
बचपन जवानी और फिर जिंदगी रुखसत करते हैं।
सच बताऊँ तो कभी छोर नहीं पाये हम उस शहर को
दिल के टुकड़े कर कर के जाने कितने घर बनते हैं।
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बात करो सलीके से तुमको जवाब मिलेगा
हाँ जवाब तुम्हारे जवाब का उसका सवाल है।
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कौन बहाता हैं आँसू साकी अपने प्यार की खातिर
गम का मौसम बनता है बस तेरे जाम की खातिर।
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