ghazlein
ख़ामोशी अब खलने लगी है
शायद इशारे करने लगी है।
सावन में साजन आयेंगे सुनकर
सजनी भी थोड़ा शरमाने लगी है।
मोबाइल की मुहब्बत में मुहब्बत नहीं है
यह बातें वो मुझे खत से बताने लगी है।
हवा भी वही है, खुशबू वही है
करीब हमारे वो आने लगी है।
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भुलक्कड़ है लेकिन वो प्यारी बहुत है
पारो! ने जुल्फें सँवारी बहुत है।
बातों पर बातें करवा लो उससे
अकेले में लेकिन शरमाती बहुत है।
यूँ तो खाती नहीं वो इक रोटी
समोसे ले आओ खाती बहुत है।
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