hawa kahan apni harkaton se baaz aati hai

हवा कहाँ अपनी हरकतों से बाज आती है 
यहाँ दीपक बुझाती है वहाँ आग लगाती है। 

महबूबा आसानी से नहीं आती बाँहों में 
तड़पते रहते हैं हम और वो तड़पाती है। 

हमको शिकायत है तुमसे भी और तुमसे भी 
भूख नहीं जानती मजबूरियाँ मेरी, बस सताती है। 

वो कहाँ सोचता है झूठ बोलने से पहले 
माँ बूढी है सच मानकर थाली बजाती है। 

अनजान बनी रही अँगने में वो मेरा नाम सुनकर
बगिया में झूमकर मेरे संग जो गाना गाती  है। 

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