Baatein

सोच रहाँ हूँ में की दर्जी बन जाऊँ
दिलों के घाव को सीना सीख जाऊँ।

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परेशानी है तो है हम मुस्कुरायेंगे 
सुर साथ नहीं देते फिर भी गायेंगे 
समंदर कलंदर सिकंदर या छुछंदर 
सब डर जायेंगे जब हम डरायेंगे। 

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गम के सागर के बीचों बीच उम्मीद की नाव के ऊपर खड़ा मैं, मेरे मन के डगमगाने पर सोचता हूँ की अब डूब जाऊँ तभी मुझको एक लहर किनारे को छूती हुवी दिखायी देती है, मन हिलोरे खाने लगता है और मैं सोचता हूँ की अब वहीं पर जाके लेटना है, मेरे ये दो दोस्त एक उम्मीद की नाँव और आँखों के ख्वाब इतनी आसानी से मरने तो नहीं देंगे खैर कुछ भी हो लेटेंगे तो वहीं उसी किनारे पर जिसको मेरी महबूब लहर छूके गुजरी है। 


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