chalo ekk sham chalte hain
चलो इक शाम चलते हैं
शहर से दुर थोड़ा दुर
हार और जीत से आगे
छोटी सी उन गलियों में
जहाँ गाल पर रंग लगाने
पारो घर पर आती है।
चलो इक शाम चलते हैं
शहर से दुर थोड़ा दुर
कुछ वादों को पूरा करने
उस बरगद के नीचे मिलने
जहाँ पहली दफा मुझको
पारो ने प्यार से देखा।
चलो इक शाम चलते हैं
शहर से दुर थोड़ा दुर
शतरंज की चालों से बचकर
पैदल चलकर खेत किनारे
जहाँ राजा को सैर कराने
पारो घोड़ी लाती है।
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