Majdur

मजदुर 

कभी-कभी मैं सोचता हूँ की ऐसा क्या है जो पैंतालीस से भी ज्यादा तापमान पर, जिसमे हम जैसे इंसान सामान्य पंखें के नीचे बिस्तर पर सोने में भी काफी असहज महसूस करते हैं, उसमे यह इंसान, माफ़ करना यह मजदुर अपने आँख के तारों के ऊपर भी सामान लादकर नंगे पाँव निकल पड़ा है, आग उगलती सड़कों पे न चाहते हुवे भी अंगारों पे चलने का करतब दिखाते हुवे जहाँ ऊपर से सूरज भी कुछ ज्यादा ही प्यार बरसा रहा है, शायद वह भी सोच रहा होंगा की बहरी सरकारें कहाँ सुनेगी जब ईश्वर तक नहीं सुन रहा। 
अब उसके पाँव में छाले नहीं होते चमड़ी  बिलकुल ही मर चुकी है, शायद आत्मा साथ है अभी तक, मगर कब तक दर दर भटकता हुवा आत्मसम्मान आत्मा को इस अधूरे शरीर के साथ संजो के रख पायेगा यह कहना मुश्किल है।   
शरीर अधूरा इसलिए क्यूंकि अब इसमें दिल नहीं है, इसके चेहरे पर मुझे मुस्कान भी तो नहीं दिखाई देती, आँखों में ख्वाब तो उनके बचे होते हैं जिनको सुख चैन की नींद नसीब होती है। 
सवाल यह भी है की जिस मकान की नीवं के पत्थर को यह उठाते हैं या यूँ कहें की आधुनिक भारत के सपनों का बोझ उठाकर चलते हैं, उनको यहाँ जगह क्यों नहीं है? 
क्यों हम चंद कागज के टुकड़ो के पीछे इतने पागल हो चुके है की असहाय को आश्रय नहीं दे पा रहे, क्या वो बचपन की कहानी सिर्फ किताबों के लिए थी जिसमे कुटिया में लेटा हुआ  बैठ जाता है फिर दो बैठे हुवे और दो को आश्रय देने के लिए खड़े हो जाते हैं और ऐसे ही रात बीत जाती है। 
यह वायरस का प्रकोप को भी एक तरह की रात ही समझो, माना थोड़ी लम्बी है, खैर क्या फर्क पड़ता है, सरकार का काम सरकार को पता है और बाकी सबकी रात कट ही जाएगी लेटे लेटे लेकिन कुछ सवाल रह जायेंगे 
जिस रेल की पटरियों के निर्माण के लिए जिन हाथों ने हथोड़ा चलाया और जिस शरीर को वहां पसीना बहाना था, वो वहाँ खून क्यों बहा के चले गए?
दया, करुणा के साथ और भी बहुत सारे जो मानवीय गुण हैं वो उस समय क्यों  गायब हो जाते हैं जब उनकी जरुरत होती है ?
सवाल तो और भी बहुत हैं जिनके जवाब नहीं मिलते मुझे। 



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