paro poem
छुअन को भूल जाते हैं
एहसास याद रहते हैं
हवा को किसने देखा है
सदा से साथ रहते हैं।
क्यूँ चुप रहते है
चुपचाप सहते हैं।
यह दुनिया जालिम है
खुद जालिम कहते हैं।
उस रात का मंजर क्या तुमको याद है पारो
जब मजबूरियाँ मिलकर हमारे बीच में आयी
पायलिया ने बिछुड़न का एक गीत गाया था
वो रुनझुन याद कर करके आँखें रोज बहती है
हम तो मुरझा गए थे हिज्र की अगली सुबह को ही
पर सुना है तुम फूल सी अब भी खिलखिलाती हो
वो जो नयी कली कोई खिली है तुम्हारे अँगने में
क्या तुम उसको प्यार के किस्से सुनाती हो
या उसको भी डाँट कहती हो की
यह सब बकवास की बातें
फिर हाथ में किताब देती हो
मगर याद रखना
एक दिन वो बड़ी होगी
तो उसको भी प्यार होगा
तब तुम अलमारी से निकाल कर उसको वो
पायल दे देना, जिसके सवालों की चुभन
तुमसे बर्दाश्त नहीं होती।
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