duniya kuch dinon se ajeeb ho gyi

दुनिया कुछ दिनों से अजीब हो गयी 
रेखा सच में अब गरीब हो गयी। 

अब तो गड्डी भी मेरी भाव खाने लगी है 
कीमत डीजल की अस्सी के करीब हो गयी। 

कपड़ों से पहचाने जाते हैं यहाँ पर बाशिंदे 
यह तो चुनाव जितने की तरतीब हो गयी। 

मुश्किल वक़्त में दोस्त छोड़ कर चले गए 
यहाँ सियासत ही हमारी रक़ीब हो गयी। 

महँगाई बेरोजगारी सब जायेंगे रसातल में 
विकास नाम की एक नयी तरकीब हो गयी। 

यार बुरा न मानो हम तो सच कहते हैं 
माफ़ करना गर कोई बात अजीब हो गयी। 

- मुदित सांड (Mudit sand)

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