bahut hai by mudit sand

चुप-चुप सी रहती है वो यह सब कहते हैं 
मगर मुझसे मिल के वो बतियाती बहुत है। 
खाना बनाना तो आता नहीं है उसको 
खैर हमको तो जानेमन पकाती बहुत है। 

राज़ नहीं है कोई उस संदूक में, नहीं होगा 
मगर सच सुनो वो आप सब से छुपाती बहुत है।


रहती थी गुमसुम सी वो घर के इक कोने में 
आज बाजार में जाती है तो मुस्कुराती बहुत है। 

बचपन में जो हाथ आसमाँ छूने को तरसते थे 
सभी के बच्चों को वो अब सपने दिखाती बहुत है। 

माटी से खेला करती थी दिन भर 
आज भी खिलौने वो बनाती बहुत है। 
मासूमियत उसकी ज़माने को पता है 
खैर मुझे तो वो घर पर सताती बहुत है। 
 

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