aankhon se nikalta huva paani

आँख से निकला हुवा पानी जब जमीन पर गिरता है 
तो वो उसमे समा जाता है और उसका निजी अस्तित्व नहीं रहता 
मगर तुम एक काम करना उसको नीचे गिरने ही न देना 
उस कतरे को हथेली पर थाम बड़े गौर से देखो 
ठीक वैसे ही जैसे तुमने पहली बार अपने पहले प्यार को देखा था। 
बहुत गहरायी होती है एक पानी की बून्द में 
उसके भीतर रौशनी से बन रहे प्रतिबिम्बों में 
तुम्हे तुम्हारा जीवन दिखाई दे पड़ेगा 
कभी मुस्कुराती हुवी या फिर कभी उदास सी 
कभी नजरें चुराती हुवी या फिर कभी इशारे करती हुवी 
कभी बाल बनाती हुवी या फिर कभी खुले केशों से कहर ढाती हुवी 
कभी रूठती हुवी तो कभी मनाती हुवी 
कभी न्यूज़ वालों की तरह चिलाती हुवी तो कभी सन्यासी की तरह शांत 
कभी प्यार के लिए तड़पती हुवी तो कभी तड़पाती हुवी 
कभी रात भर नींद ही नहीं आती तो कभी उठने का मन ही नहीं होता होगा 
कभी कुछ तो कभी कुछ 
ऐसे ही तुम्हे तुम्हारी ज़िन्दगी के बहुत सारे रंग इसमें दिखाई देंगे 
उस आंसू की बून्द को जमीन पर मत गिरने देना 
वो सारे रंग तुम्हे अपने दुप्पटे में फिर से संजोने हैं। 


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आँसू को हथेली पर रखकर कुछ इस कदर निहारो 
जैसे तुम अपने पहले प्यार को पहली बार देख रहे हो 
पानी की एक बूँद में ज़िन्दगी के कईं रंग घुले मिलेंगे। 

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