paro dekho rooth gayi hai

मैं न जानूं गीत कहाँ पर 
गजल कहाँ पर छूट गयी है 
सावन के मौसम में यारों 
पारो देखो रूठ गयी है। 

सुनसान सी सड़कों पर 
चलते चलते बातें करते 
बीच बीच में मीठी मीठी 
मेरे कानो को जो 
बहुत पसंद थी 
वह ध्वनि भी शायद 
अब तो पीछे छूट गयी है 
उछल कूद करती हुयी
पारो के पैरों मैं देखो 
कहीं बीच रस्ते में शायद
पायलिया टूट गयी है। 





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