hathon ke ghav
तेरे हाथों में जो घाव हे
कहीं तो चोट की होगी
किसी सड़क के पत्थर पे
या फिर पेड़ की डाली से
नहीं तो फिर कुछ राज हे
जो कमरे में बिखरे कांच हे
मालूम मुझे की दर्द नहीं
हाथों की छोटी खरोंचो से
जो भयंकर पीड़ा हो रही
वो मासूम ह्रदय पे चोटों से
तू नहीं जानता पीड़ा हे
मुझको तुझसे भी चार गुना
तेरे हाथों के घाव देख
मेरी आँखों में पानी हे
अब तक जान चुका होगा कि
ये सब कुछ जान पाता हे
केवल मेरी हलचल से ही
मुझको पहचान जाता हे
फिर भी छुपाता फिरता हे
हर बार सच कहानी से
और कहानी झूठ बयां करती
हर बार आँखों के पानी से।
-मुदित
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