Darwaje ke us par

दरवाजे के उस पार तब एक नई नवेली वादी थी
अनजान जगह अनदेखे चेहरे और अनसुनी बातें थी
अनजान राह ये चलते चलते तब गज्जर तक जाती थी
ये लम्बा रास्ता लम्बा था या तब लम्बा लग जाता था
ये नई जगह और पहला दिन तब सन्नाटा छाता था
और नई वीरान रात सुनसान ख्वाब दिखती थी

फिर वक़्त गुजरता गया कईं लोग मिलते गये
बातें हुयी मुलाकातें हुवी और दोस्त मिलते गये
अब लम्बे रस्ते छोटे थे संग दोस्त जो होते थे
गज्जर भाभा टैगोर नेहरू अनगिनत लम्हे संजोये थे
समय तीव्र गति से जाता हे हमको स्वामी तक लाता हे

तब अनजान जगह थी अब पूरी वादी अपनी हे
तब अनदेखे चेहरे थे अब संगी साथी अपने हे
तब अनसुनी बातें लगती अब सारी बातें अपनी हे
कोई राह अनजान नहीं अब सारी राहें अपनी हे
दिन रात और रात दिन अब सारे लम्हे अपने हे

फिर आयी वो एक रात मालूम हे कल जाना हे
सारे दोस्त साथ हे फिर भी सब चुप चाप हे
एक दोस्त जो बोला था पूरी रात वो डोला था
फिर जल्द सवेरे जाते हे यादें समेट ले आते हे
अब मुझको जाना हे फिर से उस दरवाजे तक
दुरी बस इतनी सी हे न जाने मगर कितनी सी हे
फिर से वही दरवाजा हे इस के पार ही जाना हे
मन में फिर से उलझन हे और कईं अफ़साने हे।

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