Mukamal ishq dialogue
इश्क़ एक सफर है सहर से सहर तक का ओर यह सफर तब मुकम्मल हो जाता है जब प्यार में एक मुसाफिर हार स्वीकार कर पागल हो जाये या फिर प्यार पाकर दो दिल दीवाने, लेकिन मेरी कहानी कुछ अलग है, मेने इस सफर को कभी मुकम्मल होने ही नहीं दिया क्योंकि में पागल-दीवाना हूँ।
पारो! इश्क़ एक सफर है सहर से सहर तक का ओर यह सफर तब मुकम्मल हो जाता है जब प्यार में एक मुसाफिर हार स्वीकार कर पागल हो जाये या फिर प्यार पाकर दो दिल दीवाने, लेकिन तुम तो मुझे जानती हो ना पारो, जानती हो ना कि में पागल-दीवाना हूँ और इसलिए हमारा यह सफर कभी मुकम्मल नहीं हो पायेगा।
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