swarn dwar

कभी एक शाम चलते है  शहर से दूर , थोड़ा दूर क्षितिज के उस पार स्वर्ण द्वार की ओर जिसके प्रहरी स्वयं त्रिकाल हाथ में त्रिशूल लिए खड़े रहते हैं। यह द्वार नहीं खुलता, यहाँ समय भी गतिमान नहीं है, यही शून्य है। इस द्वार के भीतर प्रवेश करना है तो सूक्ष्म बनना पड़ेगा, इस द्वार के उस ओर कुछ साथ नहीं जाता प्रेम, घृणा, पाप, पुण्य, यह-वह कुछ भी नहीं जाता। इन सब को पीछे छोर कर स्वयं शून्य बनना होगा, यह द्वार फिर भी नहीं खुलेगा, परन्तु अब आप स्वयं के भीतर की यात्रा कर इस द्वार को पार कर लेंगे।
-मुदित


कभी एक शाम चलते है
शहर से दूर , थोड़ा दूर
क्षितिज के उस पार
मेरा गाँव है, चलो
घर को निकलते हैं।








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