Prem ki aankhein by mudit sand
नेत्र नहीं हैं मेरे-तेरे
सूरदास की आँखें हैं
अनंतकाल में संग मीरा के
कृष्ण प्रेम की पाँखें है।
अंतर्मन में खुद को खोजो
बाहर सारी बातें हैं
द्वापर सतयुग कलयुग बहाने
जो नहीं पाया गाते हैं।
धवल पत्र पर नीली स्याही
तारे टिमटिमाते हैं
परछाई में सपने देखो
सपने मिलते जाते हैं।
सच बतलाऊँ मुर्ख है मानव
यूँ ही शोक मनाते हैं
जिसने धागा खोल दिया है
मौज काटते जाते हैं।
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