itihas ki kitab

इतिहास की किताबें अब स्याही छोड़ना चाहती हैं, शायद अनगिनत जीवन और मृत्यु देखने और उतनी ही बार उनकी पुनरावर्ती देखने के बाद उन्हें ये स्याही खून प्रतीत होती हो। निरंतर इतने अनुभवों के बाद इन किताबो ने न्याय-अन्याय, सत्य-असत्य, नफरत-मोहब्बत और कथित मानवों की अन्य भी बहुत सारी मानवीय-अमानवीय प्रवर्तियों में भेद करना सिख लिया है, लेकिन आज तक यह किताबें राजा और राजा एवं गरीब और गरीब के मध्य भेद करने के नुस्खे नहीं ढूंढ पायी क्योंकि वो आज तक नहीं बदले। आज भी राजाजी के मूर्खतापूर्ण आदेशों को स्वीकार करने से बाध्य गरीब लोग जो की सच में गरीब हैं, अंधकार की तरफ धीमी गति की और अग्रसर होते हैं। उनकी इस गति को देखकर राजाजी  एक छद्म प्रकाशपुंज का निर्माण करते हैं जिससे सारे गरीब तीव्र गति से उसकी और अग्रसर हो जाते हैं लेकिन प्रकाशपुंज तो छद्म था तो उसके चारो तरफ की खाई किसी को दिखाई नहीं देती।
-मुदित 

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