Ishq
क्या मेरे इज़हार-ए -इश्क़ का ये भी अंजाम होगा
किसी दिन तुम्हारी जिंदगानी में हमारा नाम होगा।
बहुत एहतियात बरती हे कदम-ए-इश्क़ बढ़ाने में
किसी दिन तुम्हारी मंजिल ही हमारा मकाँ होगा।
तरस रहे हे जिन चंद लफ्ज-ए-इश्क़ सुनने को
किसी दिन तुम्हारी जुबां से ही हमें बयां होगा।
क्या मेरे वफ़ा-ए-इश्क़ का ये भी अंजाम होगा
किसी दिन तुम्हारे खत से हमको पैगाम होगा।
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