insan tab tak insan he

जिन्दा कहाँ अब पहले से हाथ पैर न काम करे 
सांसों का बंधन बांधे हे चलने का यूँ  ही नाम करे। 

इन आँखों ने कईं सूरज को ढलते देखा था वर्षों तक
अब खुद को ढलता देखे हे अनचाही एक शाम करे। 

जिस सीने से टकरा-टकरा हवाओं ने रुख मोड़ लिए
उस सीने के भीतर से ही अब मुझ पर कोई वार करे। 

इक चेहरे पे दिल हारा था वो तो कहाँ अब चला गया
अब दिल के भीतर झांके हे तो दर्द के मारे आह करे।

हर महफ़िल में गाया करते अब वो आवाज तो नहीं रही
आँखों से आंसू टपक रहे अब वो ही कुछ आवाज करे।

जिन कंधो पे अभिमान किया वो तो अब साथ नहीं देते
चार कंधो पे जाना मुझको अब कोई तो इंतेज़ाम करे।

खुदा को इतना याद किया अब वो भी मुझको याद करे
इससे पहले की चाहने वाले मेरे चले जाने की दुआ करे। 

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