ek roj by mudit sand

इक रोज हमारे चेहरे पर वो मुस्कान पुरानी आयेगी 

इक रोज हमारे ख्वाबों में वो गालों को सहलाएगी 

इक रोज उसी तलब से हम फिर से उसको देखेंगे 

इक रोज  उन्ही अदाओं से वो फिर से हमको मारेगी। 


इक रोज हमारी यादों में फिर से उसका मिलना होगा 

इक रोज हमारे ख्वाबों में आकर वो शरमायेगी 

इक रोज हमारे होठों को अमृत पीकर जीना होगा

इक रोज  हमारी अँखियाँ भी फिर से गीली हो जाएगी। 


इक रोज हमारे दिल को वो आकर यूँ बहलाएगी 

इक रोज गलती से फ़ोन की घंटी टन-टन बज जायेगी 

इक रोज का अफसाना ये बच्चों को सुनायेगी 

इक रोज नींद भी पगली जल्दी से खुल जायेगी। 



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