Apna makan dekha h
ये जो तेरी बाहें जकड़ना चाह रही
समाना चाह रही मुझे अपने अंदर
में खुले आसमान का पंछी हूँ
उड़ना चाह रहा बहुत दूर इनसे
जहाँ तसु व्वर में मेने अपना मकाँ देखा हे।
ये जो नीर नदी का बह रहा आँखों से
बहाना चाह रहा संग मुझको अपने
में रोशन हूँ सूरज सा विपरीत तुमसे
मुझे इस रौशनी से उजाला करना हे
जहाँ तसु व्वर में मेने अपना मकाँ देखा हे।
ये जो मीठे मीठे से बोल तेरे मधु की तरह
मुझको मधुमय कर मदहोश करना चाह रहे
में कड़वा हूँ थोड़ा बाहर से पर सच्चा हूँ
और ये सच्चाई पहुंचानी हे मुझको वहां
जहाँ तसु व्वर में मेने अपना मकाँ देखा हे।
ये जो थक-हार कर तुमने जिद की हे
तुम्हारे तसु व्वर में कोई और नहीं मेरे सिवा
सच ये हे की खुद ही कैद हो अपनी ही कैद में
में तो चलना चाह रहा आजादी की उस दुनिया में
जहाँ तसु व्वर में मेने अपना मकाँ देखा हे।
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