ULJHAN

उलझन 

कुछ दाँव कुछ पेंच,
एक अजीब उलझन सी तो है।  

व्यथा घेरे जा रही मन को ,
मन भाग रहा है इधर उधर ,
मंजिल चाहता हे पर, पर क्या,
पथ का पता नहीं इसको ,
कहाँ फसा है किस उलझन मे ,
क्या पता नही इसको।  

कैसी बेचैनी क्यों व्यथित हुए हो ,
कैसा दर्द हे क्यों थक गए हो ,
कैसी निराशा क्यों थम गए हो ,
कैसी उलझन क्यों फंस गए हो।  

नहीं नहीं नहीं फंसा हूँ 
जीवन के इन घेरो में ,
फिर निकल आऊंगा में ,
एक नए सवेरे में।  

कुछ दाँव कुछ पेंच,
एक अजीब उलझन सी तो है।

-Mudit sand

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